अवतरित हो चुकी आज युग-चेतना, अब 'युवा-चेतना' जागरण का समय है!
एक जुट हो शपथ लो, सपूतों बढ़ो, अब युवा-राष्ट्र के नव-सृजन का समय है!!
बज गया शंख अब भी हो भू पर पड़े, क्या तनिक भी नहीं राष्ट्र से प्यार है?
है ये अनुराग मन में, या भयभीत हो, या पराजय तुम्हें आज स्वीकार है?
घेरकर हैं खड़े, सारे कौरव तुम्हें, 'पार्थ' गांडीव लो, आज रण का समय है!
क्या हुआ कि धधकती वो ज्वाला नहीं? क्यों मनों में तरंगित शिवाला नहीं?
भिड़ गया था जो सीता-हरण के समय, वो जटायु था कोई निराला नहीं!
मौन को तोड़ दो, वायु को मोड़ दो, जागो 'बजरंग' ये लंका-दहन का समय है!
वासना की गरल आँधियाँ हैं चली, तीव्र तूफान है स्वार्थ की वृत्ति का!
क्रोध विद्युत है, लालच भरे अभ्र हैं, बरसता है उदिक मोह-अनुरक्ति का!
लोकहित 'पूज्यवर' फिर हैं 'गिरिधर' बने, तुम भी लाठी लगा लो, श्रेय-धन का समय है!
विश्व व्याकुल है, मानव विकल हो रहा, सबके मन में सघन घोर तम व्याप्त है!
पीर मन की हरो, प्राण उर में भरो, तुम सजल हो, प्रखरता तुम्हें प्राप्त है!
जल रही हैं मशालें विचार-क्रांति की, 'प्रज्ञापुत्रों' प्रखर आचरण का समय है!
- रोहित 'अथर्व'
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Thursday, April 16, 2009
Monday, April 13, 2009
आह्वान
युवा,
जिसका चिंतन कभी वृद्ध नहीं हुआ ।
जिसे विश्वास है अपने-आप पर ।
जिसमें उमंग है, साहस है, जोश है,
कुछ कर-गुजरने का ।
जो सक्षम है, हवाओं का रूख मोड़ने में ।
युवा,
जिसे भय नहीं, कितना भी गहरा तम हो ।
जिसे संशय नहीं रत्ती भर भी अपनी जीत पर ।
जिसकी आँखों में स्वप्न है,
एक “उज्जवल भविष्य” के निर्माण का ।
युवा,
जो कभी जीता नहीं,
अपनी प्रसिद्धि या पहचान के लिए ।
जो जीता और मरता है तो बस,
अपने मूल्यों के आन के लिए ।
युवा,
जिसे गर्व है, अपनी संस्कृति पर ।
जिसे भान है, अपनी मर्यादा का ।
जिसे बोध है, अपने कर्तव्यों का ।
———————————————–
आवाहन है, आमंत्रण है,
ऐसे सभी युवाओं का,
इस युग-संधि की वेला में ।
कि अब वक्त आ गया है,
अपनी-अपनी भूमिका निभाने का ।
अपने प्रतिभा-परिष्कार से,
और अपने चरित्र-चिंतन-व्यवहार से,
समस्त विश्व के सामने,
एक उदाहरण प्रस्तुत करने का ।
ताकि गूँज उठे यह प्रतिध्वनि चारों ओर,
कि- “हे असुरता,
अब समय आ गया है,
कि तुम दूर हो जाओ,
मानव-मात्र की मानसिकता से ।
वरना, कहीं इस विचार-क्रांति की ज्वाला में,
तुम्हें तिल-तिल जलकर मरना न पड़े ।”
- राजेश 'आर्य'
————————————————————-
*युवा चेतना शिविर, पुणे (भारत)
६ से ८ नवम्बर २००९
सम्पर्क : connectingrohitit@gmail.com
जिसका चिंतन कभी वृद्ध नहीं हुआ ।
जिसे विश्वास है अपने-आप पर ।
जिसमें उमंग है, साहस है, जोश है,
कुछ कर-गुजरने का ।
जो सक्षम है, हवाओं का रूख मोड़ने में ।
युवा,
जिसे भय नहीं, कितना भी गहरा तम हो ।
जिसे संशय नहीं रत्ती भर भी अपनी जीत पर ।
जिसकी आँखों में स्वप्न है,
एक “उज्जवल भविष्य” के निर्माण का ।
युवा,
जो कभी जीता नहीं,
अपनी प्रसिद्धि या पहचान के लिए ।
जो जीता और मरता है तो बस,
अपने मूल्यों के आन के लिए ।
युवा,
जिसे गर्व है, अपनी संस्कृति पर ।
जिसे भान है, अपनी मर्यादा का ।
जिसे बोध है, अपने कर्तव्यों का ।
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आवाहन है, आमंत्रण है,
ऐसे सभी युवाओं का,
इस युग-संधि की वेला में ।
कि अब वक्त आ गया है,
अपनी-अपनी भूमिका निभाने का ।
अपने प्रतिभा-परिष्कार से,
और अपने चरित्र-चिंतन-व्यवहार से,
समस्त विश्व के सामने,
एक उदाहरण प्रस्तुत करने का ।
ताकि गूँज उठे यह प्रतिध्वनि चारों ओर,
कि- “हे असुरता,
अब समय आ गया है,
कि तुम दूर हो जाओ,
मानव-मात्र की मानसिकता से ।
वरना, कहीं इस विचार-क्रांति की ज्वाला में,
तुम्हें तिल-तिल जलकर मरना न पड़े ।”
- राजेश 'आर्य'
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*युवा चेतना शिविर, पुणे (भारत)
६ से ८ नवम्बर २००९
सम्पर्क : connectingrohitit@gmail.com
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